नदियों में प्रदूषण

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पिछले कुछ वर्षों में औद्योगिकीकरण एवं शहरीकरण के कारण प्रमुख नदियों में प्रदूषण का बोझ बढ गया है। सिंचाई, पीने के लिए, बिजली तथा अन्य उद्देश्यों के लिए पानी के अंधाधुंध इस्तेमाल से चुनौती काफी बढ गयी है।

नदियां नगर निगमों के शोधित एवं अशोधित अपशिष्ट एवं औद्योगिक कचरे से प्रदूषित होती हैं। सभी बड़े एवं मझौले उद्योगों ने तरल अपशिष्ट शोधन संयंत्र लगा रखे हैं और वे सामान्यत: जैव रसायन ऑक्सीजन मांग (बीओडी) के निर्धारित मानकों का पालन करते हैं। हालांकि कई औद्योगिक क्षेत्र देश के कई हिस्सों में प्रदूषण को काफी बढा देते हैं। नगर निगम अपशिष्ट के मामले में ऐसा अनुमान है कि प्रथम श्रेणी शहर (423) और द्वितीय श्रेणी शहर (449) प्रति दिन 330000 लाख लीटर तरल अपशिष्ट उत्सर्जित करते हैं जबकि देश में प्रति दिन तरल अपशिष्ट शोधन की क्षमता महज 70000 लाख लीटर है। अपशिष्ट पदार्थों के शोधन का काम संबंधित नगर निगमों का होता है। जबतक ये निगम प्रशासन पूर्ण क्षमता तक अपशिष्टों का शोधन नहीं कर लेते तबतक डीओबी की समस्या का समाधान नहीं हो सकता है।

नदी संरक्षण केंद्र और राज्य सरकारों के सामूहिक प्रयास से लगातार चल रहा है। राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना (एनआरसीपी) के तहत नदियों के पानी की गुणवत्ता में सुधार के लिए प्रदूषण घटाने संबंधी कार्य चलाए जा रहे हैं। एनआरसीपी के तहत 20 राज्यों में गंगा, यमुना, दामोदर, और स्वर्णरेखा समेत 37 नदियों के प्रदूषित खंडों पर ध्यान दिया जा रहा है। जवाहर लाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीकरण मिशन जैसी अन्य केंद्रीय योजनाओं तथा राज्यों की शहरी अवसरंचना विकास योजना जैसी योजनाओं के तहत भी नदी संरक्षण गतिविधियां चल रही हैं।

नदी संरक्षण कार्यक्रम के क्रियान्वयन पर भूमि अधिग्रहण की समस्या, सृजित परिसंपत्तियों के सही प्रबंधन नहीं हो पाने, अनियमित बिजली आपूर्ति, सीवरेज शोधन संयंत्रों के कम इस्तेमाल आदि का प्रतिकूल असर पड़ता है।